Why is there an allegation of running the House in an undemocratic manner?:

Editorial: सदन को गैर लोकतांत्रिक तरीके से चलाने का आरोप क्यों

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Why is there an allegation of running the House in an undemocratic manner?

Why is there an allegation of running the House in an undemocratic manner?: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला पर नेता विपक्ष राहुल गांधी का यह आरोप गंभीर है कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा। इसके अलावा उनका यह कहना भी चिंता की बात है कि सदन को गैर लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जा रहा है। हालांकि नेता विपक्ष किस संदर्भ में यह बात कह रहे हैं, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है। यह भी साफ नहीं है कि आखिर सदन की कार्यप्रणाली उन्हें किस प्रकार से गैर लोकतांत्रिक नजर आई है।

वैसे, सदन में सत्ता और विपक्ष के बीच बयानों के तीर चलते हैं, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर पहले भी टिप्पणी कर चुके राहुल गांधी ने अब फिर इन आरोपों को लगाकर देश में बहस भी छेड़ दी है। मौजूदा समय में विपक्ष की एकता जगजाहिर है, राज्यों में साथ मिलकर चुनाव लडऩे से परहेज करने वाले विपक्षी नेता सदन में एकजुट नजर आते हैं। यह भी देखने को मिलता है कि उनकी एकता सदन की कार्यवाही में रोड़ा अटकाने के काम ही ज्यादा आ रही है। विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नजर आती है, वह हर बार ऐसे मामलों को सदन में उठाता है, जिनका संदर्भ नहीं होता और वे सिर्फ सदन के समय को दूसरे प्रकरणों में व्यतीत करने भर के लिए होते हैं।

इस बार नई लोकसभा के गठन और राहुल गांधी के नेता विपक्ष बनने के बाद सदन और उसके बाहर उनकी टिप्पणियां कई मायनों में अनोखी रही हैं। यह भी सुनने को मिला, जब नेता विपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि ओम बिड़ला बतौर स्पीकर प्रधानमंत्री के समक्ष झुकते हैं। उनका मंतव्य यह था कि प्रधानमंत्री मोदी इतने सर्वोच्च हैं कि लोकसभा स्पीकर अपने पद की गरिमा को कम करते हुए प्रधानमंत्री के समक्ष नतमस्तक होते हैं। यह काफी बेतुकी बात प्रतीत होती है, क्योंकि पदों के बावजूद सामाजिक शिष्टाचार अपनी जगह है, उसे कैसे भुलाया जा सकता है। क्या स्पीकर को अपने पद को बड़ा दिखाने के लिए प्रधानमंत्री की अनदेखी कर देनी होगी?

गौरतलब है कि विपक्ष की ओर से कुछ सांसदों को डांट कर चुप कराने के दौरान यह भी तुलना की गई है कि स्पीकर महज दो बार के चुनाव विजेता हैं, जबकि जिन्हें चुप कराया गया वे पांच बार के सांसद हैं। क्या इस प्रकार की तुलना उचित है। निश्चित रूप से पांच बार क्या कोई अगर इससे ज्यादा बार भी अगर निर्वाचित होकर सदन में पहुंचता है तो उसे स्पीकर पद नहीं मिल जाएगा। यह पद अनेक पैमानों पर और राजनीतिक विमर्श के बाद प्रदान किया जाता है। और वैसे भी सदन में अनुशासन कायम रखने की जिम्मेदारी स्पीकर की है, तब उन पर इस प्रकार के आरोप लगाना संसदीय परंपराओं का अपमान है।

ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की ओर से बजट सत्र शुरू होने से पहले जो बातें कही गई हैं, वे विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाती हैं। उनका यह कहना भी उचित ही है कि विपक्ष को जनमत का फैसला स्वीकार करना चाहिए। वास्तव में विपक्ष के उन नेताओं के तेवर आजकल विचित्र ही हैं, जोकि अनुमान से कहीं बढक़र सीटें जीत कर सदन में पहुंचे हैं। उन्हें यह प्रतीत हो रहा है कि इस बार के लोकसभा चुनाव का जनादेश भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए नहीं अपितु कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए था। हालांकि जनता में तमाम ऐसे समूह रहे होंगे, जोकि गुमराह होकर ऐसे फैसले लेते रहे, हालांकि देश की बड़ी आबादी ने इस बार भी भाजपा और उसके सहयोगी दलों को ही सरकार बनाने का जनादेश प्रदान किया है।

कांग्रेस लगातार संविधान को क्षति पहुंचाने का आरोप भाजपा पर लगा रही है। लेकिन संसद में जिस प्रकार का आचरण विपक्ष की ओर से पेश किया जा रहा है और व्यर्थ के मुद्दे उठाकर समय और पैसे की बर्बादी करवाई जा रही है, क्या वह संविधान सम्मत है। क्या यही एकमात्र काम रह गया है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च कर सरकार बने और फिर विपक्ष उसके गिरने के सपने लेता रहे और अगर वह इसमें सफल नहीं होता है तो सरकार के कार्यों में मीन-मेख निकाल कर अपनी मौजूदगी को साबित करता रहे। वास्तव में नेता विपक्ष राहुल गांधी के आरोप की सत्यता को परखा जाना चाहिए।

हालांकि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से अगर प्रत्येक सांसद, मंत्री को बोलने का समय दिया जाता है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या नेता विपक्ष की बात ही सर्वोपरि है। निश्चित रूप से उनकी पार्टी के लिए जो समय निर्धारित है, उसी में उन्हें अपनी बात रखनी होगी। दरअसल, आरोपों का यह दौर कुछ और भी कहानी कहता है। जरूरी यही है कि देश में सकारात्मक राजनीति हो, बेशक यह दूर की कौड़ी नजर आती है। लेकिन सदन का समय कीमती होता है, ऐसे में उसे राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। 

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