'शाही ईदगाह का मस्जिद की तरह इस्तेमाल हो सकता है या नहीं'... सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Krishna Janmabhoomi Dispute

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नई दिल्ली। Krishna Janmabhoomi Dispute: मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह मामले में नया मोड़ आ गया है। हिन्दू पक्ष की शाही ईदगाह को एएसआइ संरक्षित स्मारक बताए जाने के खिलाफ मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। शाही मस्जिद ईदगाह की इंजतामिया कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के गत पांच मार्च के फैसले को चुनौती दी है।

हाई कोर्ट ने भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से दाखिल अर्जी को स्वीकार करते हुए मूल वाद (शाही ईदगाह पर दावा करने वाला मूल मुकदमा) में संशोधन करने और शाही ईदगाह को एएआइ संरक्षित स्मारक बताने के तथ्य को शामिल करने की इजाजत दी थी।

एससी में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने पक्षकारों के तौर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) और केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी थी। मस्जिद कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा है कि इससे मूल मुकदमे का स्वरूप बदल गया है और इतना नहीं इससे मस्जिद कमेटी द्वारा पूजा स्थल कानून को आधार बनाकर मूल वाद की सुनवाई पर उठाए सवाल की दलीलें भी नकर जाती हैं।

यह याचिका शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए लगी थी जिस पर कोर्ट ने आठ अप्रैल को विचार करने का निर्णय लिया और सुनवाई टाल दी। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मस्जिद कमेटी की हाई कोर्ट द्वारा सभी मुकदमों को एक साथ सुनवाई के लिए संलग्न करने के आदेश को चुनौती देने वाली अर्जी को सुनवाई के लिए पुर्न बहाल करने की मांग पर भी हिन्दू पक्षकारों को नोटिस जारी किया है।

शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दोनों याचिकाएं सुनवाई पर लगीं थीं। सीजेआइ ने मस्जिद कमेटी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील तसनीम अहमदी से कहा कि हाई कोर्ट ने सिर्फ याचिका में संशोधन की अर्जी मंजूर की है। आप उस पर बहस करिये। हाई कोर्ट के आदेश में गलत क्या है।

जस्टिस खन्ना ने कहा कि जहां तक यह प्रश्न है कि एएसआइ संरक्षित स्थल का उपयोग मस्जिद के रूप में किया जा सकता है या नहीं यह सवाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, और उस मामले में कोर्ट ने आदेश दिया था कि कोई प्रभावी आदेश जारी नहीं किया जाएगा। आपने हाई कोर्ट को यह नहीं बताया। इस पर अन्य मामले की गुण दोष के आधार पर विचार करना होगा।

हिन्दू पक्ष का आवेदन

मालूम हो कि हाई कोर्ट में हिन्दू पक्ष का आवेदन इस इस दावे पर आधारित था कि एएसआइ संरक्षित स्मारक पर पूजा स्थल कानून लागू नहीं होगा। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने अहमदी से यह भी कहा कि आपको शिकायत में संशोधन करने और पक्षों को पक्षकार बनाने का अधिकार है। कोई भी पक्ष पूर्व प्रभाव से माना जाएगा या नहीं, ये एक अलग मुद्दा है।

पीठ ने कहा कि वे भी याचिका में संशोधन कर सकते हैं और इस मुद्दे को इस आधार पर उठा सकते हैं कि पूजा स्थल कानून लागू नहीं होगा। हाई कोर्ट का आदेश ठीक लगता है। यह कोई नया मामला नहीं है। जब आप कोई नया बचाव पेश करते हैं तो उन्हें उसे चुनौती देने का अधिकार है। जब अहमदी ने कहा कि इस मामले का निहितार्थ समझा जाना चाहिए।

उन्होंने अपनी दलीलें रखनी चाहीं लेकिन कोर्ट ने कहा कि वह इस पर आठ अप्रैल को सुनवाई करेगा।हाई कोर्ट का हिन्दू पक्ष की अर्जी स्वीकार कर मूल वाद में संशोधन और एएसआइ व केंद्र सरकार को पक्षकारों के तौर पर जोड़ने की इजाजत देना इस मुकदमे में महत्वपूर्ण मोड़ लाता है क्योंकि मस्जिद कमेटी के मुताबिक ऐसा होने से कमेटी द्वारा पूजा स्थल कानून का हवाला देकर मूल मुकदमे की सुनवाई योग्यता पर उठाए गए कानूनी आधार समाप्त हो जाते हैं।

स्मारक को एएसआइ संरक्षित बताने से मूल वाद का स्वरूप बदल जाता है। यही दलील मस्जिद कमेटी सुप्रीम कोर्ट में दे रही है। उसका यह भी कहना है कि मूल मुकदमे की सुनवाई पर सवाल उठाने वाली उसकी अपील अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है जबकि इसी बीच हाई कोर्ट ने मूल वाद में संशोधन की इजाजत दे दी है।

शुक्रवार को हिन्दू पक्ष की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने कोर्ट में कहा कि कोर्ट में यह मुद्दा विचाराधीन है कि एएसआइ संरक्षित स्मारक पर पूजा स्थल कानून लागू नहीं होता। हाई कोर्ट में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से अर्जी दाखिल कर मूल वाद में संशोधन की इजाजत मांगते हुए दावा किया गया था कि शाही मस्जिद ईदगाह को 1920 में संयुक्त प्रांत के लेफ्टीनेंट गवर्नर द्वारा जारी अधिसूचना के जरिये संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था।

यह अधिसूचना प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम की धारा तीन के तहत जारी की गई थी। नतीजतन वर्तमान मामले में पूजा स्थल कानून 1991 लागू नहीं होगा। उसने इसके दस्तावेज भी पेश किये थे जिन्हें देखते हुए हाई कोर्ट ने आवेदन मंजूर कर लिया था। मालूम हो कि पूजा स्थल कानून 1991 कहता है कि धार्मिक स्थलों की वही स्थिति रहेगी जो 15 अगस्त 1947 को थी, उसके चरित्र में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।